300 साल पहले June में क्या होता था? सच जानकर पसीना आ जाएगा

 


क्या हमेशा से ऐसा ही था? क्या हमारे दादा-परदादा भी इसी आग में जलते थे? या ये गर्मी कुछ नई है, कुछ अलग है? सच कहें तो — नहीं। 300 साल पहले इतनी गर्मी नहीं पड़ती थी। और इसके पीछे एक बड़ी कहानी है।

300 साल पहले की दुनिया

सन् 1700 के आसपास पूरी दुनिया एक ऐसे दौर में थी जिसे वैज्ञानिक Little Ice Age यानी छोटा हिम युग कहते हैं। यूरोप में नदियाँ जम जाती थीं। इंग्लैंड की Thames नदी पर लोग सर्दियों में मेले लगाते थे — बर्फ पर चलकर।

भारत का हाल भी अलग था। हिमालय के ग्लेशियर बड़े हुए थे। उत्तर प्रदेश की गुफाओं से मिले पत्थरों पर वैज्ञानिकों ने पढ़ा कि 1489 से 1820 तक यहाँ ठंडक और नमी ज़्यादा थी। यह वही दौर था जब मुगल बादशाह अकबर का राज था  और उस ज़माने की गर्मी आज जैसी कतई नहीं थी।

इसे साबित किया है गुफाओं के पत्थरों ने, बर्फ की परतों ने, पेड़ों की उम्र बताने वाले छल्लों ने।

फिर गर्मी कब से बढ़ी?

यही असली मोड़ है। Nature Climate Change की एक रिसर्च बताती है कि 1860 के आसपास से समुद्र का तापमान बढ़ना शुरू हुआ  जब इंग्लैंड और यूरोप में कारखाने धुआँ उगलने लगे। वही धुआँ, वही कोयला, वही ईंधन जिसने दुनिया को गर्म करना शुरू किया।

NASA के डेटा के मुताबिक, 1880 से 2005 के बीच दुनिया का औसत तापमान करीब 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। सुनने में कम लगे, पर यह बदलाव बहुत बड़ा है। NOAA की रिपोर्ट कहती है कि 2024 पूरे रिकॉर्ड इतिहास का सबसे गर्म साल रहा — 1850 के मुकाबले 1.46 डिग्री ज़्यादा गर्म।

और पिछले 10 साल? सभी दस साल — 2015 से 2024 — अब तक के सबसे गर्म दस साल हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं है।

भारत पर क्या असर पड़ा?

जो देश गर्मी झेलता है, उसमें हम सबसे आगे हैं। Met Office UK बताता है कि पिछले 100 सालों में तापमान जितनी तेज़ी से बढ़ा है, वो पिछले किसी हिम युग के बाद की warming से 10 गुना तेज़ है। भारत में लू (heatwave) पहले कभी-कभी आती थी। अब हर साल आती है, और हर साल पहले से ज़्यादा तेज़।

राजस्थान, UP, बिहार, दिल्ली, Punjab — सब जानते हैं कि अब मई में बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। पर यह हमेशा से ऐसा था वाली बात नहीं है।

तो असली वजह क्या है?

बात सीधी है। इंसान ने 200 साल में इतना कोयला, तेल और गैस जलाया कि हवा में CO₂ की मात्रा 38% बढ़ गई। NASA कहता है कि Industrial Revolution (करीब 1750) के बाद से यह सब शुरू हुआ।

CO₂ और मीथेन गैस सूरज की गर्मी को ज़मीन के पास रोक लेती हैं — जैसे शीशे की छत वाला कमरा। बाहर से धूप आती है, पर गर्मी बाहर नहीं जाती।

पर 300 साल पहले कारखाने नहीं थे। गाड़ियाँ नहीं थीं। AC नहीं था। इसीलिए वो दौर ठंडा था।

क्या आगे और गर्मी बढ़ेगी?

NOAA के मुताबिक अगर ऐसे ही चलता रहा तो 2100 तक तापमान 5-10 डिग्री Fahrenheit और बढ़ सकता है। यह सुनने में कम लगे, पर इसका मतलब है — और ज़्यादा लू, और ज़्यादा बाढ़, और ज़्यादा सूखा।

Paris Agreement 2015 ने कहा था — 1.5 डिग्री से ज़्यादा मत बढ़ने दो। पर 2023 में ही दुनिया का तापमान 1.75 डिग्री ऊपर चला गया था।

तो क्या करें हम?

पेड़ लगाना, बिजली बचाना, गाड़ी कम चलाना  छोटी बातें हैं, पर शुरुआत यहीं से होती है। और सबसे पहले — यह जानना कि यह गर्मी कुदरती नहीं है, इंसान की बनाई है।

300 साल पहले के लोग इस गर्मी में नहीं जलते थे। हम जल रहे हैं। और अगर हमने कुछ नहीं किया, तो 300 साल बाद के लोग हमसे भी ज़्यादा जलेंगे।

तुम क्या सोचते हो  क्या हम सच में कुछ बदल सकते हैं? Comment में बताओ, और अगर यह बात ज़रूरी लगी तो इसे एक दोस्त के साथ ज़रूर शेयर करो।


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